स्वस्थ रहने के 21 नियम

स्वस्थ रहने के 21 नियम

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आज कल के इस भाग दौड़ के के जिंदगी में हम सुब कुछ प्राप्त कर लेते है पर जो सबसे अमूल्य चीज है उसके ऊपर हम अपना ध्यान फोकस नहीं कर पाते है, कहा भी गया है ही “स्वास्थ्य ही धन है” , अंग्रेजी में कहा गया है की “हेल्थ इज वेल्थ” । स्वस्थ रहने के 21 नियम एक और कहावत है की ” पहला सुख निरोगी काया “ लेकिन हम सब कुछ पर तो इन्वेस्टमेंट कर देते हैं पर अपने स्वस्थ्य के प्रति हम उदासीन रहते हैं ।

स्वस्थ रहने के 21 नियम

स्वस्थ रहने के 21 नियम

आज के इस लेख में हम स्वस्थ रहने के 21 नियमो पर चर्चा करेंगे  :

1.  सुबह के समय खाली पेट गुनगुना पानी पियें ।

2.  सुबह खाली पेट कभी भी चाय ना पियें ।

3. दिन में 8-12 गिलास पानी सिप सिप करके जरूर पियें ।

4. अपने दवा को कभी भी ठन्डे पानी से ना लें

5. सुबहः खाने के साथ जूस पीना चाहिए ।

6. खाना को कम से कम 32 बार चबा का खाना चाहिए ।

7 खाना खाने के वक्त कभी भी पानी न पियें, पानी खाने खाने के 30 मिनट पहले या 30 मिनट के बाद पियें ।

8 खाने में सफ़ेद नमक बिलकुल बंद कर दे, सेंधा नमक का ही प्रयोग करे ।

9 खाना खाने के बाद सौंफ और गुड़ जरूर खाये।

10 सुबह या दोपहर में दही खाये ।

11 खट्टे फलो का सेवन रत में ना करें ।

12 टीवी या मोबाइल देखते हुए खाना ना खाएं।

13 रात को सोते समय अपने पास मोबाइल ना रखें ।

14 सुबह नास्ते से पहले और रात में खाना खाने के बाद 500 कदम पैदल चलें ।

15 रात ले समय दही, चावल और राजमा ना खाएं ।

16 फ्रीज़ में रखा ठंडा पानी ना पियें ।

17 रात ले समय खाने के बाद दाँत साफ करे और एक गिलास पानी पीकर सोएं।

18 शाम 5 बजे बाद भारी भोजन ना करें ।

19 हमेशा मोबाइल को बाये कान पर लगाकर मोबाइल कॉल्स का जबाब देवें।

20 रात में 10 बजे से सुबह 4 बजे तक सोएं ।

21 जिस आदमी के कब्ज रहता हैं उन्हें रात के समय पपीता खा कर सोना चाहिए ।

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AAJ MANAYE RAKSHABHANDAN – 1 आज मनायें रक्षाबंधन

AAJ MANAYE RAKSHABHANDAN

AAJ MANAYE RAKSHABHANDAN – आज मनायें रक्षाबंधन

आज मनायें रक्षाबंधन  –2

अतीत से नव स्फूर्ति लेकर ,  वर्तमान में दृढ़  उधम कर,

भविष्य में  दृढ  निष्ठा रख कर, कर्मशील हम रहे निरंतर ।। 1।।

 

आज मनायें रक्षाबंधन  –2

 

बलिदानों की परंपरा से, स्वराज है यह पावन जिसमें,

वंदन उनको कृतज्ञता से, ध्येय भाव का करें जागरण ।। 2।।

 

आज मनायें रक्षाबंधन  –2

 

स्वार्थ द्वेष को आज त्याग कर,  अहंभाव का पाश काट कर,

अपना सब व्यक्तित्व भुला कर,  विराट का हम करते दर्शन  ।। 3।।

 

आज मनायें रक्षाबंधन  –2

 

अरुण केतु को साक्षी रख कर, निश्चय वाणी आज गरज कर,

शुभ कृतिका यह मंगल अवसर,  निष्ठा मन में रहे चिरंतन ।। 3।।

 

आज मनायें रक्षाबंधन  –2

AAJ MANAYE RAKSHABHANDAN

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Amrit Vachan – Raksha Bandhan ( 1 अमृत वचन – रक्षा बंधन )

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Amrit Vachan – Raksha Bandhan ( अमृत वचन – रक्षा बंधन )

वास्तविक रक्षाबंधन का दिन तो वही होगा,  जब हिंदुओं में उत्कृष्ट एवं तेजस्वी संस्कार जागृत होगा, जिसके सूत्र में परिश्रम करके हम अखिल हिंदू समाज को बांधकर सुसंगठित करेंगे। एकत्व की अनुभूति तथा शक्ति निर्माण का आधार हिंदुत्व का भाव है । संघ अपने दैनंदिन कार्यों से इसी भाव की सृष्टि में संलग्न है।   परम पूजनीय श्री गुरु जी

Amrit Vachan – Raksha Bandhan ( अमृत वचन – रक्षा बंधन )

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Raksha Bandhan – Bhav Geet (रक्षा बंधन – भाव गीत) शुद्ध सात्विक प्रेम अपने,  कार्य का आधार है 1

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Raksha Bandhan – Bhav Geet भाव गीत – रक्षाबंधन

शुद्ध सात्विक प्रेम अपने,  कार्य का आधार है ।

दिव्य ऐसे प्रेम में,  ईश्वर स्वयं सकार है ।

प्रेम जो केवल समर्पण,  भाव को ही जानता है।

और उसमें ही स्वयं की,  धन्यता बस मानता है ।

राष्ट्र भर में स्नेह भरना,  साधना का सार है ।।1।।

शुद्ध सात्विक ——————————-

Raksha Bandhan – Bhav Geet (रक्षा बंधन – भाव गीत)

भारत जननी ने किया, वात्सल्य से पालन हमारा ।

है कृपा इसकी मिला यह,  प्राण तन जीवन हमारा ।

भक्ति से हम हो समर्पित, बस यही अधिकार है ।।2।।

शुद्ध सात्विक ——————————-

जाति , भाषा,  प्रांत आदि,  वर्ग  भेदों को  मिटाने।

दूर अर्थाभाव करने, तम अविद्या को हटाने ।

नित्य ज्योतिर्मय हमारा,  हृदय स्नेहागार  है ।।3।।

शुद्ध सात्विक ——————————-

कोटी आंखों से निरंतर,  आज आंसू बह रहे हैं ।

आज अगणित बंधु भगनि, यातनाएं सह रहे हैं ।

दुख हर सुख दे सभी को,  बस यही अधिकार है ।।4।।

शुद्ध सात्विक ——————————-

Raksha Bandhan – Bhav Geet (रक्षा बंधन – भाव गीत)

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GURU PURNIMA : RSS गुरु पूर्णिमा बौद्धिक 1

GURU PURNIMA

गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA आषाढ़ मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाया है । प्राचीन काल  से ही भारतीय संस्कृति में  गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व रहा है।

लगभग 5270 वर्ष पूर्व में महर्षि कृष्ण द्विपायन जी ने आज ही के दिन सभी उपनिषीदो एवं वेदों को संकलित कर दुनिया के सामने श्री मद भगवत गीता का लोकार्पण किया था। उनका जन्म भी इसी दिन हुए है।  बाद में उनका नाम वेद व्यास हुआ इसलिए इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

GURU PURNIMA

GURU PURNIMA

गुरु किसे कहते है या गुरु का किया अर्थ होता है ?

गुरु वह जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाये , जो हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जावे , जो हमारे जीवन का मार्गदर्शन कर सके उसे गुरु कहते है। व्यक्ति कि प्रथम गुरु उनकी माँ होती है ।

गुरु वे जो समदराष्ट्रा हो , सर्वग्राही हो , संस्पर्शी हो , सर्वव्यापी हो जो केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पुरे राष्ट्र का मार्ग दर्शन कर सके।

GURU PURNIMA पर गुरु की महिमा का वर्णन करना अति आवश्यक है ।

संत तुका राम ने कहा है कि गुरु के बिना समाधान नहीं होता है इसलिए गुरु के पाँव पखारिये।

जगत गुरु शंकराचार्य गुरु कि खोज में केरल से विंध्याचल तक का प्रवास किया।

नरेंद्र को स्वामी विवेका नन्द किसने बनाया वह गुरु ही था ।

गुरु की महिमा इस दोहे से हम समझते हैं  :-

” गुरु गोविन्द दोउ खड़े,  काके लागु पाँव ” 

” बलहारी गुरु आपने , गोविन्द दिओ बताय ।  “

यदि गुरु ओर गोविन्द यानि की भगवान एक साथ एक जगह खड़े हो तो किसके पहले पाँव छुए जाये , तब भगवान स्वयं ही गुरु का नाम पहले बता देते हैं, अर्थात गुरु का भगवान से भी बड़ा दर्जा मिला हुआ है । एक ओर दोहे से गुरु के महत्व का समजने की कोशिश करते है  :

” यह तन विष री बेलड़ी, गुरु अमृत का खान “।

” शीश दिए गुरु मिले , तो भी सस्ता जान ।। 

इस दोहे में साफ साफ अर्थ निकलता है की हमारा शरीर एक विष की बेल है जबकि गुरु अमृत की खान है , अगर अपना शीश देने के बदले अगर गुरु मिले तो वह भी सस्ता है।

गुरु और माँ एवं बाप कभी भी कठोर नहीं होते है , अगर कभी कठोर लगे तो एक बार रूक कर देखना चाहिए कि कही गुरु अपनी परीक्षा तो नहीं ले रही है  निम्न दोहा से यह बात समझ में आता है  :-

” गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है , गढ़ गढ़ काढ़े खोट “

” अंतर हाथ सहार दे,  बहार मारे चोट ” 

इस दोहे का मतलब है कि कैसे कुम्हार घड़ा को बनाते समय आकर देते समय पीटता हुआ नजर आता है पर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि कुम्हार का एक हाथ घड़ा के अंदर से सहारा दिया हुआ होता है । ठीक वैसे गुरु और माँ बाप होते अगर आपको कभी लगता हैं की वे कठोरता के पेश आते हैं । 

एक व्यक्ति के अनेक गुरु हो सकते है । जिस किसी से भी कुछ आपने सीखा है वह उस क्षेत्र के आपके गुरु हुए । आप चींटी से भी कुछ सिख सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रारम्भ विजय दसवीं के दिन सन 1925 में परम पूजनीय डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेवार ने कुछ स्कूली छात्रों के साथ मिलकर किया था । अब 100 वर्ष होने को है ।

संघ कुल 6 उत्सव मानते है सबसे पहला वर्ष प्रतिपदा , हिन्दू साम्राज्यदिनों उत्सव, गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA , रक्षा बंधन , विजयदसवी उत्सव और मकर संक्रांति ।

गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA उसमे से एक है , हिन्दू समाज के तरह ही संघ भी गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA के उत्सव को मानते है ।

संघ में गुरु कौन ?

संघ में भगवा ध्वज को गुरु मानते है। संघ के निर्माता डॉ हेडगेवार ने काफी सोच विचार करने के बाद संघ को भगवा ध्वज को ही गुरु माना क्योकि किसी व्यक्ति में कभी भी स्वार्थ , कमी , ईष्या आदि आ सकते है लेकिन भगवा ध्वज जो की एक तत्व है । संघ के स्वयं सेवक भगवा ध्वज को ही गुरु मानते हुए प्रतिदिन संघ की शाखा में योग व्यायाम खेल और बौद्धिक कार्यक्रम करते है।    

भगवा ध्वज ही गुरु क्यों  / भगवा ध्वज  की महत्ता

प्राचीन काल से ही भगवा ध्वज हिन्दू संस्कृति का अमिट प्रतीकों में से एक है ।  श्री राम , श्री कृष्ण, अर्जुन, क्षत्रपति शिवा जी महाराज अपने रथों पर भगवा ध्वज को फहराया, हमारे पूर्वजो ने मंदिरो के ऊपर , मठो के ऊपर भगवा रंग के ही ध्वज को  लगाया है।

भगवा ध्वज वीरता  और  त्याग का प्रतिक है । जब भी कोई योद्धा रणक्षेत्र में लड़ने के लिए जाता है तब वह अपने शिर पर भगवा रंग के ही पत्ता बांध कर जाते है। अर्थात भगवा रंग को हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्व है।

गुरु के प्रति समर्पण 

प्राचीन कल से ही गुरु प्रति समर्पण की चर्चा आपलोगो ने सुनी होगी जिसमे कुछ है :-

  1. कृष्ण , बलराम और सांदीपनि
  2. शिवजी महाराज और समर्थ दस जी महाराज
  3. गुरु भक्त आरुणि और गुरु द्यौम्य
  4. एकलव्य और द्रोणाचार्य

बौद्धिक में इन सभी के वर्णन कर सकते है।

समर्पण हमें किनको करनी है , समर्पण उनको जिनको समर्पण की कोई जरुरत नहीं है, जो हमारे समर्पण को हमारे लिए ही उपयोगी बना दे , जैसे सूरज को पानी को कोई जरुरत नहीं है फिर भी हम उनको जल चढ़ाते है और सूरज उस पानी का मेघ बनकर हमारे लिए ही उपयोगी बना देते है।

समर्पण उनको जिनसे हमारा समर्पण धन्य हो जाये।

धन का समर्पण करने से धन से मोह काम होता है , तन समर्पण करने से हमारा शरीर ह्रस्ट पुष्ट होता है , मन का समर्पण करने से अभिमान में  में कमी आती है ,

संघ में गुरु दक्षिणा 

जब गुरु की चर्चा चली है तब गुरु दक्षिणा का भी चर्चा होनी चाहिए। संघ आज तक किसी भी संस्था से कोई चंदा नहीं लेते है वह केवल और केवल स्वयं सेवक के द्वारा समर्पण के तौर पर दिया गया गुरु दक्षिणा से ही साल भर के खर्चो का निस्तारण करते है। संघ में सर्व प्रथम गुरु दक्षिणा सन 1928 में हुई जिसमें 84 रुपया और कुछ पैसे शामिल है , इस राशि में किसी स्वयं सेवक के आधा पैसे भी शामिल है।

इस बौद्धिक में कुछ समसमयकी विषय जोड़कर बौद्धिक का अंत करना चाहिए जैसे GURU PURNIMA 2024 में पर्यावरण जैसे विषय को जोड़कर अपनी वाणी को विराम देनी चाहिए।

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Crisis and Courage संकट और साहस

Crisis and Courage संकट और साहस

Crisis and Courage संकट और साहस

बाल गंगाधर तिलक अपने सहपाठियों के साथ छात्रावास की छत पर बैठकर वार्तालाप कर रहे थे।  वार्तालाप की इस कड़ी में एक विद्यार्थी ने कल्पना करते हुए कहा कि अगर नीचे हमारे साथियों पर पर अगर कोई संकट आ जाए तो उनकी सुरक्षा के लिए शीघ्रता से हम नीचे कैसे उतर पाएंगे ? अथवा कौन,  कैसे जल्दी पहुंचने का प्रयास करेगा?

पहला लड़का बोला मैं  सीढ़ियों  से दौड़ता हुआ निकल जाऊंगा।   दूसरे ने कहा –  मैं रस्सी के द्वारा दीवान के सहारे नीचे पहुंचूंगा . सब अपनी अपनी सोच से एक दूसरे से अवगत करा रहे थे,  कि एक ने पूछा  ” तिलक तुम ऐसे संकट के घड़ी में क्या करोगे “?

बाल गंगाधर तिलक ने अपनी धोती कसी बड़ी सावधानी और कुशलता से नीचे चलांग लगा दी।  कूदते समय यह वाक्य बोला  “मैं  ऐसा करूंगा ”

सभी साथी चिल्ला पड़े,  अरे यह क्या ????  सब एक साथ देखने के लिए नीचे दौड़े की कहीं तिलक को चोट तो नहीं आई ।

जब वे लोग सीढ़ीओ में पहुंचे तो उन्हें देखकर प्रशन्नता हुई  की बाल गंगाधर तिलक स्वयं  सकुशल ऊपर आ रहे थे।

यह है Crisis and Courage संकट और साहस का सच्चा उदहारण।

Crisis and Courage संकट और साहस

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गुरु पूर्णिमा अमृत वचन

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा अमृत वचन

हम जिस गुरु की पूजा करते है उसके गुणों को भी अपने अंदर लाना चाहिए । यदि उन गुणों को जीवन में नहीं लायेंगे तो कर्त्तव्य पूर्ति नहीं होगी। जो अपने गुरु के साथ अधिक से अधिक एकात्म और एकरूप होता है, वही उसकी पूजा कर सकेगा अन्य कोई नहीं । जिस आदर्श की पूजा करने हेतु एकत्र  हुए है उसका निर्देशित जीवन अपने अंदर उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए । तभी हम जिस आदर्श व उद्देश्य को लेकर चल रहे है उसे आगे बढ़ा सकेगें। – परम पूजनीय श्री गुरूजी गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा

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मानसिक सेहत , तनाव और जंक फ़ूड

मानसिक सेहत , तनाव और जंक फ़ूड

आज कल के भाग दौड़ की जिंदगी में हम अपने स्वस्थ्य का ध्यान नहीं रख रकते है, मानसिक सेहत , तनाव और जंक फ़ूड एक दूसरे से जुड़े हुए है,  जब भी हम तनाव में होते है  तब हमारा दिल करता है की कोई न कोई जंक फ़ूड खाया जाय और हम केवल यह समझ कर जंक फ़ूड की और आकर्षित होते है कयुँकि ज्यादा से ज्यादा हमारा थोड़ा वजन बढ़ जाएगा  और कुछ नहीं जबकि तनाव में जंक फ़ूड खाने से हमारी चिंताए और बढ़ जाती है ऐसा शोध में पाया गया है।

मानसिक सेहत , तनाव और जंक फ़ूड

मानसिक सेहत , तनाव और जंक फ़ूड

यूनिवर्सिटी का कोलोरेडो के एक नए शोध से पता चला है कि तनाव के समय अस्वस्थकर भोजन करने से हमारा चिंता का और बढ़ जाते हैं हर कोई जानता है की फास्ट फूड हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है लेकिन फिर भी हमारा समाज वह खा रहा है जो हमारे स्वस्थ्य के लिए सही नहीं है।

हमारे बीच यह बात प्रचलित है कि जब हम उच्च कैलोरी वाले मीठा या फास्ट फूड खाते हैं तो हमें भावनात्मक रूप से तृप्ति मिलती है और हमारी भावनात्मक स्थिति में सुधार होती है इस शोध से इस प्रचलित धारणा को चुनौती मिलती है।

माइंड टॉक  की वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक और कार्यकारी डायरेक्टर नेहा केड़ाबम कहती है जब आप तनाव में होते हैं तो समोसा या बर्गर खाने का मन करता है लेकिन यह आखिरकार एक जाल है जो आपकी चिंता को और बढ़ा सकता है।

कुछ ऐसे फ़ास्ट फ़ूड है जो हमारे स्वस्थ्य पर बहुत ही बुरा डालते है  :-

ट्रांस और सैचुरेटेड वसा फ़ूड : 

कुरकुरे तले हुए व्यंजन में पाए जाने वाले वासा सूजन का कारण बनते हैं और हमारे मस्तिष्क के स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं।

रिफाइंड शुगर :

अगर आपको चीनी बहुत ज्यादा पसंद है और आप बहुत अधिक मात्रा में ग्रहण करते है तो तो यह आपके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है आपको घबराहट और बेचैनी महसूस हो सकती है।

प्रत्येक कृत्रिम चीज  :

हर वह कृत्रिम चीज चाहे वह कृत्रिम रंग हो चाहे स्वाद बढ़ाने वाले कोई पदार्थ हो तो वह आपके तंत्रिका तंत्र में गंभीर समस्याएं हैं पैदा कर सकते हैं जिससे हमारे चिंता बढ़ जाती है।   आगे  नेहा केड़ाबम कहती है की  यह तत्व आपके मेटाबॉलिज्म और मस्तिष्क के रसायन को बाधित करते हैं जिससे चिंता और बढ़ जाती है।

मानसिक सेहत, तनाव कम करने के लिए फल और सब्जियाँ हमारे स्वस्थ्य के लिए बहुत ही फायदे मंद है ।

नट्स और बीज, साबुत अनाज  आदि आपके नसों को शांत करने में मदद करता है ।

जंक फ़ूड कम से कम खाये इतनी सी आग्रह है ।

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सच्चा धार्मिक कौन ?

सच्चा धार्मिक कौन

सचमुच में सच्चा धार्मिक कौन ? है इस कहानी के मार्फ़त पता चलता है , एक गांव में मेला लगा हुआ था। मेला स्थल पर एक छोटा सा कुआ था, जिसमें एक आदमी भूल बस गिर गया था। वह चिल्लाने लगा मुझे बचाओ मुझे बचाओ लेकिन मेले में बड़ा शोरगुल था कौन सुन उसकी आवाज लोग जल्दी बाजी में थे।

इतने में एक क्रांतिकारी युवक कुआं के पास आकर बैठा .उसे अंदर से आदमी की आवाज सुनाई दी,  वह बोला चुप रह,  यह बिना दीवार के कुआं किसने बनाया!  उसे मेला अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही करूंगा।  घाट होता तो तू क्यों गिरता,  यह जुल्म है मैं सबको हिला कर रख दूंगा।  यह कहते हुए वह आगे चल दिया।

इतने में एक संन्यासी आया और कुआं पर आकर बैठ गया।  कुएं के अंदर से आदमी चिल्लाया मुझे निकालो, मुझे निकालो, सन्यासी बोला भाई पिछले जन्म में तुमने कुछ कुकर्म में किए होंगे,  जिनका फल तुम भोग रहे हो . अपना अपना फल सभी को भोगना पड़ता है, इसमें कुछ भी नहीं किया जा सकता . उस आदमी ने कहा यह तुम मुझे बाद में समझा देना पहले कुएं से बाहर तो निकालो।  सन्यासी बोला देखो भाई मैं तो कर्म त्याग कर चुका हूं,  गांव के लोगों से कहूंगा वह तुम्हारी कुछ मदद कर दे।  और वह चल दिया।

इतने में एक थका हारा किसान आया सोचा पानी  खींचकर तृष्णा बुझा लूंगा,  इतने में कुएं के अंदर से आवाज आई,  मुझे निकालो,  किसान ने अंदर झाक कर  देखा एक आदमी गिर पड़ा है,  किसान बोला  भाई रस्सी तो है पर पतली है टूट जाएगी,  देखो कुछ उपाय करता हूं, उसने अपनी धोती खोली और रस्सी बांध दी,  उसकी सहायता से वह आदमी बाहर आ गया।

उस आदमी ने किसान  के पैर पकड़ लिए और कहा भाई तू ही सच्चा धार्मिक है,  सच्चा समाज सुधारक है,  उन लोगों ने तो मेरी सुनी ही नहीं।  किसान बोला भैया मै धर्म सुधर ,  समाज सुधार तो कुछ नहीं जानता ही नहीं हूं पर यह जानता हूं कि जो दूसरों की फिक्र करता है, वही धनवान होता है।  सभी में राम जी रहते हैं जैसी अपनी बच्चों की फिक्र वैसा ही दूसरो की फिक्र यही सच्ची दया है, धर्म है

सच्चा धार्मिक कौन

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न त्वहं कामये राजयं

न त्वहं कामये राजयं ,  न स्वर्गं न पुनर्भवम् ।

कामये दुःख तप्तानां , प्राणि प्राणिनामार्ति नाशनम।।

भावार्थ : मैं राज्य की कामना नहीं करता, मुझे स्वर्ग और मोक्ष नहीं चाहिए । दुःख से पीड़ित प्राणियों के दुःख दूर करने में सहायक हो सकूँ, यही मेरी कामना है।

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