मकर संक्रांति (makar sankranti par bhashan) और 2026 का भारत – सामाजिक सुरक्षा, स्वावलंबन, शिक्षा और संस्कार

makar sankranti par bhashan

🌞 मकर संक्रांति (makar sankranti par bhashan) और 2026 का भारत – सामाजिक सुरक्षा, स्वावलंबन, शिक्षा और संस्कार

भूमिका

सभी सम्माननीय उपस्थितजनों और मेरे प्यारे मित्रों को नमस्कार।

आज हम एक ऐसे पर्व और विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं जो हमारे जीवन, हमारे समाज और हमारे भविष्य से गहरे जुड़े हैं।
मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं है। यह सिर्फ पतंग उड़ाने, तिल-गुड़ खाने या गंगा में स्नान करने का दिन नहीं है। यह पर्व हमें जीवन की दिशा बदलने, सकारात्मक सोच अपनाने और समाज में जिम्मेदारी निभाने का संदेश देता है।

जैसे सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण होता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी अंधकार से प्रकाश की ओर, आलस्य से कर्म की ओर, भय से साहस की ओर बढ़ने का समय आता है।

आज हम 2026 के भारत में खड़े हैं। एक ऐसा भारत जो तकनीक, डिजिटलाइजेशन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में है। लेकिन सवाल यही है –
क्या हमारी युवा शक्ति सुरक्षित है?
क्या हमारी शिक्षा जीवन देने वाली है?
क्या हमारे समाज में संस्कार और नैतिकता जीवित हैं?
क्या हम स्वावलंबी हैं या केवल दूसरों पर निर्भर?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें मकर संक्रांति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व में मिलते हैं।


🌞 मकर संक्रांति (makar sankranti par bhashan)का पौराणिक महत्व

मकर संक्रांति पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्व वाला पर्व है।

  1. भीष्म पितामह का देह त्याग
    महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह ने अपने देह त्याग का निर्णय केवल उत्तरायण के समय किया। यह घटना हमें सिखाती है कि सही समय और धैर्य से किए गए कार्यों का परिणाम महान होता है।

  2. सूर्य देव और शनिदेव
    कथा है कि शनि देव अपने पिता सूर्य से अलग रहते थे। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जो पुत्र के साथ पुनर्मिलन का प्रतीक है। यह हमें जीवन में संबंध सुधारने और मतभेद दूर करने का संदेश देता है।

  3. गंगा का पृथ्वी पर आगमन
    राजा भगीरथ के तप से गंगा नदी स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी। मकर संक्रांति के दिन गंगा में स्नान करना पुण्यदायी माना गया। इसका आध्यात्मिक अर्थ है – मन और आत्मा की शुद्धि।

  4. देवताओं की नई शुरुआत
    उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा गया है। इस दिन किया गया जप, पूजा और दान कई गुना फलदायक होता है।

  5. तिल-गुड़ का महत्व
    तिल हमारे पुराने कर्मों का प्रतीक हैं और गुड़ मिठास का। तिल-गुड़ खाने का संदेश है – बीते हुए अनुभवों की कड़वाहट छोड़ो और जीवन में मिठास भरो।

  6. पतंग का प्रतीकात्मक अर्थ
    पतंग उड़ाना केवल खेल नहीं है। डोर से बंधी पतंग हमारी संस्कार और अनुशासन को दर्शाती है।
    डोर टूट जाए, तो पतंग गिरती है; संस्कार टूट जाए, तो जीवन भटकता है।


🌞 मकर संक्रांति (makar sankranti par bhashan) का वैज्ञानिक महत्व

  1. सूर्य की स्थिति
    मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका अर्थ है कि सूर्य उत्तरायण होता है, दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होती हैं।

  2. ठंड में लाभ
    उत्तरायण के बाद सूर्य की किरणें अधिक शक्तिशाली होती हैं।

  • शरीर में विटामिन D का स्तर बढ़ता है

  • इम्यून सिस्टम मजबूत होता है

  • ठंड से होने वाली बीमारियाँ कम होती हैं

  1. स्नान का लाभ
    ठंडे पानी में स्नान करने से:

  • रक्त संचार बेहतर होता है

  • त्वचा के रोमछिद्र खुलते हैं

  • शरीर रोगों से लड़ने में सक्षम बनता है

  1. तिल और गुड़
    सर्दियों में तिल और गुड़ खाने से शरीर को गर्मी, ऊर्जा और हड्डियों की मजबूती मिलती है।

  2. कृषि और फसल
    उत्तरायण के समय सूर्य की ऊर्जा से फसलें पकती हैं और धरती की उर्वरता बढ़ती है।


🌞 भारत में मकर संक्रांति का उत्सव

भारत में इस पर्व को अलग-अलग नामों और परंपराओं से मनाया जाता है:

  • उत्तर भारत: मकर संक्रांति – गंगा स्नान, खिचड़ी, तिल-गुड़

  • गुजरात: उत्तरायण – पतंग महोत्सव

  • महाराष्ट्र: मकर संक्रांति – तिलगुल

  • पंजाब: लोहड़ी – आग जलाना, रेवड़ी, मूंगफली

  • तमिलनाडु: पोंगल – चार दिन का फसल उत्सव

  • आंध्र प्रदेश/तेलंगाना: संक्रांति – मुग्गुलु, गायों की पूजा

  • कर्नाटक: सुग्गी – किसान उत्सव

  • असम: माघ बिहू – सामूहिक भोज

  • केरल: मकरविलक्कु – सबरीमाला में ज्योति दर्शन

सभी जगहों पर भावना एक है – सूर्य, प्रकृति और नई शुरुआत का उत्सव।


🌞 मकर संक्रांति से जुड़ी घटनाएँ

  1. भीष्म पितामह का देह त्याग

  2. सूर्य देव और शनिदेव का मिलन

  3. गंगा का पृथ्वी पर आगमन

  4. देवताओं की नई शुरुआत

  5. सूर्य द्वारा पृथ्वी को ऊर्जा देना

🌞 मकर संक्रांति से जुड़ी प्रमुख घटनाएँ – विवरण सहित

1️⃣ भीष्म पितामह का देह त्याग

कथा:
महाभारत में भीष्म पितामह को वरदान मिला था कि वे इच्छा अनुसार मृत्यु चुन सकते हैं।
महाभारत युद्ध के दौरान, कुरुक्षेत्र में उन्होंने शरशय्या पर अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा की, लेकिन केवल उत्तरायण के समय ही उन्होंने देह त्यागा।

महत्व:

  • उत्तरायण को पवित्र और पुण्यकारी माना गया।

  • भीष्म पितामह की यह कथा धैर्य, अनुशासन और सही समय का महत्व सिखाती है।

  • संदेश: जीवन में कर्म और समय का बहुत महत्व है; धैर्य से किया गया कार्य फलदायक होता है।

शिक्षा:

  • जीवन में जल्दीबाजी न करें।

  • सही समय पर निर्णय लेना सर्वोत्तम होता है।


2️⃣ सूर्य देव और शनिदेव का मिलन

कथा:
शनि देव अपने पिता सूर्य देव से अलग रहते थे।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं।
इस दिन सूर्य देव का शनि देव के साथ पुनर्मिलन होता है।

महत्व:

  • यह संबंध सुधारने और मतभेद दूर करने का प्रतीक है।

  • दर्शाता है कि कठिन समय और दूरी के बाद भी संबंधों में मेल और सामंजस्य संभव है।

शिक्षा:

  • परिवार और समाज में संबंध बनाए रखना चाहिए।

  • मतभेदों को क्षमा और समझ के साथ हल करना चाहिए।


3️⃣ गंगा का पृथ्वी पर आगमन

कथा:
राजा भगीरथ ने तपस्या की और गंगा नदी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया।
गंगा माता का आगमन तब हुआ जब उन्होंने पापियों का उद्धार करने का निर्णय लिया।
मकर संक्रांति के दिन गंगा में स्नान करना पापों से मुक्ति और शुद्धता का प्रतीक है।

महत्व:

  • यह दिन मन और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है।

  • धार्मिक दृष्टि से स्नान और दान का विशेष महत्व है।

शिक्षा:

  • जीवन में आत्म-शुद्धि और सुधार की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

  • दान और सेवा से आत्मा शुद्ध होती है।


4️⃣ देवताओं की नई शुरुआत

कथा:
पुराणों में कहा गया है कि मकर संक्रांति से देवताओं की ऊर्जा पृथ्वी पर अधिक सक्रिय होती है।
इस दिन सभी देवताओं की पूजा और दान करना विशेष फलदायक माना गया।

महत्व:

  • नए कार्यों और प्रयासों की शुरुआत के लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है।

  • धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति सकारात्मक ऊर्जा का समय है।

शिक्षा:

  • जीवन में नई शुरुआत करने का समय हमेशा आता है।

  • शुभ अवसर का उपयोग करके सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहिए।


5️⃣ सूर्य द्वारा पृथ्वी को ऊर्जा देना

कथा:
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और अधिक प्रकाश और ऊर्जा पृथ्वी पर भेजते हैं।
इस समय सूर्य की किरणें शरीर, फसल और जीवन शक्ति को प्रभावित करती हैं।

महत्व:

  • यह प्राकृतिक चक्र जीवन के लिए अनिवार्य है।

  • फसल पकती है, शरीर में विटामिन D बनता है, स्वास्थ्य बेहतर होता है।

शिक्षा:

  • सूर्य की रोशनी और ऊर्जा का सही उपयोग करें।

  • जीवन में ऊर्जा और सक्रियता बनाए रखें।


🌟 सारांश

मकर संक्रांति से जुड़ी ये घटनाएँ केवल धार्मिक कथाएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण संदेश भी देती हैं:

  • धैर्य और सही समय का महत्व (भीष्म पितामह)

  • संबंधों में मेल और सामंजस्य (सूर्य-शनि मिलन)

  • आत्मा और मन की शुद्धि (गंगा का आगमन)

  • नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा (देवताओं का उत्सव)

  • जीवन में सक्रियता और स्वास्थ्य (सूर्य की ऊर्जा)

ये कथाएँ हमें सिखाती हैं कि मकर संक्रांति केवल त्योहार नहीं है, बल्कि जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का दिन है।


🌟 2026 में भारत – सामाजिक सुरक्षा

आज के भारत में डिजिटल तकनीक ने जीवन आसान किया है, लेकिन सुरक्षा के खतरे भी बढ़ गए हैं।

  • साइबर अपराध

  • महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा

  • बुजुर्गों की उपेक्षा

  • नशाखोरी

सामाजिक सुरक्षा का मतलब सिर्फ पुलिस या कानून नहीं है।
यह है – परिवार, स्कूल, समाज और स्वयं की जिम्मेदारी।

मकर संक्रांति हमें याद दिलाती है कि जैसे सूर्य अंधकार हटाता है, वैसे ही समाज से डर और असुरक्षा हटाना हमारा धर्म है।


🌟 स्वावलंबन – आत्मनिर्भर भारत

स्वावलंबन का अर्थ है खुद खड़ा होना।
2025 में युवा कई अवसरों में काम कर सकते हैं:

  • डिजिटल मार्केटिंग

  • यूट्यूब/ब्लॉगिंग

  • ऑनलाइन कोचिंग

  • फ्रीलांसिंग

  • स्टार्टअप

लेकिन असली स्वावलंबन तब होता है जब हम देश और समाज पर भरोसा रखते हुए खुद अपने पैरों पर खड़े हों।

मकर संक्रांति हमें प्रेरित करती है – अपने जीवन का सूर्य खुद बनो।


🌟 शिक्षा – केवल डिग्री नहीं, दिशा

आज लाखों युवा पढ़े-लिखे हैं, पर बेरोजगार हैं।
कारण – शिक्षा ने सोचना और बनाना नहीं सिखाया।

हमें चाहिए:

  • समस्या सुलझाने की क्षमता

  • नैतिक शिक्षा

  • सोचने और निर्णय लेने की कला

Skill-based और life-oriented education ही 2025 के भारत को सशक्त बनाएगा।


🌟 संस्कार – भारत की आत्मा

संस्कार हमें सिखाते हैं:

  • माता-पिता और गुरु का सम्मान

  • समाज की जिम्मेदारी

  • राष्ट्र प्रेम

  • सहानुभूति और संवेदनशीलता

संस्कार के बिना शिक्षा और स्वावलंबन अधूरे हैं।
पतंग की डोर की तरह संस्कार हमारी आत्मा को जीवन में ऊँचाई देते हैं।


🌟 मकर संक्रांति – प्रेरक संदेश

  • पुराने दुख और असफलताएँ छोड़ो

  • सकारात्मक सोच अपनाओ

  • समाज और परिवार की जिम्मेदारी निभाओ

  • शिक्षा और स्वावलंबन के माध्यम से जीवन को सशक्त बनाओ

  • संस्कार और नैतिकता को कभी मत भूलो

जैसे सूर्य हर दिन नई रोशनी लाता है, वैसे ही हमारा कर्म और प्रयास जीवन में प्रकाश लाए।


मकर संक्रांति केवल त्योहार नहीं, यह जीवन दर्शन और नई शुरुआत का प्रतीक है।
2026 के भारत के लिए यह हमें सिखाता है:

  • सुरक्षित समाज का निर्माण

  • युवा शक्ति का सही दिशा में उपयोग

  • शिक्षा को जीवन के अनुकूल बनाना

  • संस्कार और नैतिकता का पालन

यदि हम इन चार स्तंभों – सामाजिक सुरक्षा, स्वावलंबन, शिक्षा और संस्कार – पर खड़े होंगे, तो हमारा भारत न केवल शक्तिशाली, बल्कि आत्मनिर्भर, सुरक्षित और संस्कारी बन जाएगा।

जैसे सूर्य उत्तरायण होकर अंधकार को दूर करता है, वैसे ही हम अपने जीवन और समाज से नकारात्मकता, आलस्य और अज्ञानता को दूर करें।
इस संदेश के साथ मैं आप सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ देता हूँ।

निष्कर्ष (Conclusion)

मकर संक्रांति केवल त्योहार नहीं है, बल्कि यह जीवन में नई शुरुआत, सकारात्मक बदलाव और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। अगर आप अपने जीवन में सामाजिक सुरक्षा, स्वावलंबन, शिक्षा और संस्कार को अपनाते हैं, तो आप न केवल खुद सशक्त बनेंगे, बल्कि समाज को भी मजबूत बना सकते हैं।

👉 आज से ही छोटे-छोटे बदलाव शुरू करें – अपने जीवन में अनुशासन, ज्ञान और नैतिकता लाएं। परिणाम धीरे-धीरे आपको दिखने लगेंगे।

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GURU PURNIMA : RSS गुरु पूर्णिमा बौद्धिक 1

GURU PURNIMA

गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA आषाढ़ मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाया है । प्राचीन काल  से ही भारतीय संस्कृति में  गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व रहा है।

लगभग 5270 वर्ष पूर्व में महर्षि कृष्ण द्विपायन जी ने आज ही के दिन सभी उपनिषीदो एवं वेदों को संकलित कर दुनिया के सामने श्री मद भगवत गीता का लोकार्पण किया था। उनका जन्म भी इसी दिन हुए है।  बाद में उनका नाम वेद व्यास हुआ इसलिए इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

GURU PURNIMA

GURU PURNIMA

गुरु किसे कहते है या गुरु का किया अर्थ होता है ?

गुरु वह जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाये , जो हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जावे , जो हमारे जीवन का मार्गदर्शन कर सके उसे गुरु कहते है। व्यक्ति कि प्रथम गुरु उनकी माँ होती है ।

गुरु वे जो समदराष्ट्रा हो , सर्वग्राही हो , संस्पर्शी हो , सर्वव्यापी हो जो केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पुरे राष्ट्र का मार्ग दर्शन कर सके।

GURU PURNIMA पर गुरु की महिमा का वर्णन करना अति आवश्यक है ।

संत तुका राम ने कहा है कि गुरु के बिना समाधान नहीं होता है इसलिए गुरु के पाँव पखारिये।

जगत गुरु शंकराचार्य गुरु कि खोज में केरल से विंध्याचल तक का प्रवास किया।

नरेंद्र को स्वामी विवेका नन्द किसने बनाया वह गुरु ही था ।

गुरु की महिमा इस दोहे से हम समझते हैं  :-

” गुरु गोविन्द दोउ खड़े,  काके लागु पाँव ” 

” बलहारी गुरु आपने , गोविन्द दिओ बताय ।  “

यदि गुरु ओर गोविन्द यानि की भगवान एक साथ एक जगह खड़े हो तो किसके पहले पाँव छुए जाये , तब भगवान स्वयं ही गुरु का नाम पहले बता देते हैं, अर्थात गुरु का भगवान से भी बड़ा दर्जा मिला हुआ है । एक ओर दोहे से गुरु के महत्व का समजने की कोशिश करते है  :

” यह तन विष री बेलड़ी, गुरु अमृत का खान “।

” शीश दिए गुरु मिले , तो भी सस्ता जान ।। 

इस दोहे में साफ साफ अर्थ निकलता है की हमारा शरीर एक विष की बेल है जबकि गुरु अमृत की खान है , अगर अपना शीश देने के बदले अगर गुरु मिले तो वह भी सस्ता है।

गुरु और माँ एवं बाप कभी भी कठोर नहीं होते है , अगर कभी कठोर लगे तो एक बार रूक कर देखना चाहिए कि कही गुरु अपनी परीक्षा तो नहीं ले रही है  निम्न दोहा से यह बात समझ में आता है  :-

” गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है , गढ़ गढ़ काढ़े खोट “

” अंतर हाथ सहार दे,  बहार मारे चोट ” 

इस दोहे का मतलब है कि कैसे कुम्हार घड़ा को बनाते समय आकर देते समय पीटता हुआ नजर आता है पर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि कुम्हार का एक हाथ घड़ा के अंदर से सहारा दिया हुआ होता है । ठीक वैसे गुरु और माँ बाप होते अगर आपको कभी लगता हैं की वे कठोरता के पेश आते हैं । 

एक व्यक्ति के अनेक गुरु हो सकते है । जिस किसी से भी कुछ आपने सीखा है वह उस क्षेत्र के आपके गुरु हुए । आप चींटी से भी कुछ सिख सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रारम्भ विजय दसवीं के दिन सन 1925 में परम पूजनीय डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेवार ने कुछ स्कूली छात्रों के साथ मिलकर किया था । अब 100 वर्ष होने को है ।

संघ कुल 6 उत्सव मानते है सबसे पहला वर्ष प्रतिपदा , हिन्दू साम्राज्यदिनों उत्सव, गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA , रक्षा बंधन , विजयदसवी उत्सव और मकर संक्रांति ।

गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA उसमे से एक है , हिन्दू समाज के तरह ही संघ भी गुरु पूर्णिमा GURU PURNIMA के उत्सव को मानते है ।

संघ में गुरु कौन ?

संघ में भगवा ध्वज को गुरु मानते है। संघ के निर्माता डॉ हेडगेवार ने काफी सोच विचार करने के बाद संघ को भगवा ध्वज को ही गुरु माना क्योकि किसी व्यक्ति में कभी भी स्वार्थ , कमी , ईष्या आदि आ सकते है लेकिन भगवा ध्वज जो की एक तत्व है । संघ के स्वयं सेवक भगवा ध्वज को ही गुरु मानते हुए प्रतिदिन संघ की शाखा में योग व्यायाम खेल और बौद्धिक कार्यक्रम करते है।    

भगवा ध्वज ही गुरु क्यों  / भगवा ध्वज  की महत्ता

प्राचीन काल से ही भगवा ध्वज हिन्दू संस्कृति का अमिट प्रतीकों में से एक है ।  श्री राम , श्री कृष्ण, अर्जुन, क्षत्रपति शिवा जी महाराज अपने रथों पर भगवा ध्वज को फहराया, हमारे पूर्वजो ने मंदिरो के ऊपर , मठो के ऊपर भगवा रंग के ही ध्वज को  लगाया है।

भगवा ध्वज वीरता  और  त्याग का प्रतिक है । जब भी कोई योद्धा रणक्षेत्र में लड़ने के लिए जाता है तब वह अपने शिर पर भगवा रंग के ही पत्ता बांध कर जाते है। अर्थात भगवा रंग को हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्व है।

गुरु के प्रति समर्पण 

प्राचीन कल से ही गुरु प्रति समर्पण की चर्चा आपलोगो ने सुनी होगी जिसमे कुछ है :-

  1. कृष्ण , बलराम और सांदीपनि
  2. शिवजी महाराज और समर्थ दस जी महाराज
  3. गुरु भक्त आरुणि और गुरु द्यौम्य
  4. एकलव्य और द्रोणाचार्य

बौद्धिक में इन सभी के वर्णन कर सकते है।

समर्पण हमें किनको करनी है , समर्पण उनको जिनको समर्पण की कोई जरुरत नहीं है, जो हमारे समर्पण को हमारे लिए ही उपयोगी बना दे , जैसे सूरज को पानी को कोई जरुरत नहीं है फिर भी हम उनको जल चढ़ाते है और सूरज उस पानी का मेघ बनकर हमारे लिए ही उपयोगी बना देते है।

समर्पण उनको जिनसे हमारा समर्पण धन्य हो जाये।

धन का समर्पण करने से धन से मोह काम होता है , तन समर्पण करने से हमारा शरीर ह्रस्ट पुष्ट होता है , मन का समर्पण करने से अभिमान में  में कमी आती है ,

संघ में गुरु दक्षिणा 

जब गुरु की चर्चा चली है तब गुरु दक्षिणा का भी चर्चा होनी चाहिए। संघ आज तक किसी भी संस्था से कोई चंदा नहीं लेते है वह केवल और केवल स्वयं सेवक के द्वारा समर्पण के तौर पर दिया गया गुरु दक्षिणा से ही साल भर के खर्चो का निस्तारण करते है। संघ में सर्व प्रथम गुरु दक्षिणा सन 1928 में हुई जिसमें 84 रुपया और कुछ पैसे शामिल है , इस राशि में किसी स्वयं सेवक के आधा पैसे भी शामिल है।

इस बौद्धिक में कुछ समसमयकी विषय जोड़कर बौद्धिक का अंत करना चाहिए जैसे GURU PURNIMA 2024 में पर्यावरण जैसे विषय को जोड़कर अपनी वाणी को विराम देनी चाहिए।

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शुभ घड़ीमें विराजे राम

शुभ घड़ीमें विराजे राम

शुभ घड़ीमें विराजे राम

शुभ घड़ीमें विराजे राम रघुराई…

-84 सेकेंड के अभिजीत मुहूर्त में हुई ‘रामलला’ मूर्ति की प्राण—प्रतिष्ठा

-देशवासियों के छलके आंसू जब देखी राम की सौम्य,अद्भुत छवि
-प्रतिष्ठा समारोह में दिखी सामाजिक समरसता

जयपुर। सदियों से भारतवासियों को जिस घड़ी की प्रतीक्षा थी, वो आखिरकार 22 जनवरी के विशेष शुभ मुहूर्त में साकार हो गई। अवध नगरी के मुख्य मंदिर में ‘रामलला’ अपने सौम्य श्यामल बाल स्वरूप में विराजित हुए। राम के माथे का तिलक और उनकी सौम्य मुद्रा, देखने वालों की आंखों में बस गई। राम लला के चेहरे की मुस्कान ने मन को मोह लिया।

ये अद्भुत और अलौकिक दृश्य देख पूरा देश भावुक हो उठा और ये भावनाएं आंसुओं के साथ छलक पड़ी। ये ही वो क्षण भी था जहां पर ‘सामाजिक समरसता’ भी दिखाई दी।

पिछले 500 वर्षो का इतिहास देखा जाए तो राम मंदिर की प्राण- प्रतिष्ठा उस विश्वास की विजय हैं, जिसमें असंख्य बलिदानियों का संघर्ष छुपा है किंतु अपने राम के प्रति गहरी आस्था थी जो, उस 84 सेकेंड के शुभ मुहूर्त में जीवंत हो उठी जब ‘रामलला’ मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई।

अनुष्ठान के बाद हुई पहली आरती— शुभ घड़ीमें विराजे राम

प्रभु श्री राम के पांच साल के बाल स्वरूप मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा से जुड़ी सभी जरूरी पूजा विधि दोपहर 12 बजकर 29 मिनट 8 सेकेंड से लेकर 12 बजकर 30 मिनट 32 सेकंड के अभिजीत मुहूर्त में मंत्रोच्चार के बीच हुई। अनुष्ठान के बाद पहली आरती भी संपन्न हुई। इस दौरान सर्वार्थ सिद्धि योग,अमृत सिद्धि योग,रवि योग और मृगशिरा नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बना जो अत्यंत शुभ माना जाता है।

गूंजी ‘मंगल ध्वनि’ और बज उठे वाद्ययंत्र—
प्राण प्रतिष्ठा के लिए न्यूनतम विधि- अनुष्ठान ही रखे गए थे। समारोह की शुरुआत अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर सुबह दस बजे से ‘मंगल ध्वनि’ के भव्य वादन के साथ हुई। विभिन्न राज्यों के 50 से अधिक मनोरम वाद्ययंत्र लगभग दो घंटे तक इस शुभ घटना के साक्षी बनें।

मूर्ति की विशेषता— शुभ घड़ीमें विराजे राम

शुभ घड़ीमें विराजे राम

शुभ घड़ीमें विराजे राम

रामलला की मूर्ति में बालत्व, देवत्व और एक राजकुमार तीनों की छवि दिखाई दे रही है। मूर्ति का वजन करीब 200 किलोग्राम है। इसकी कुल ऊंचाई 4.24 फीट, जबकि चौड़ाई तीन फीट है। कमल दल पर खड़ी मुद्रा में मूर्ति, हाथ में तीर और धनुष है। कृष्ण शैली में मूर्ति बनाई गई है। मूर्ति के ऊपर स्वास्तिक, ॐ, चक्र, गदा और सूर्य देव विराजमान हैं।

रामलला के चारों ओर आभामंडल है। मस्तक सुंदर, आंखें बड़ी और ललाट भव्य है। मूर्ति में भगवान विष्णु के 10 अवतार दिखाई दे रहे हैं। मूर्ति का निर्माण श्याम शिला से हुआ है, जिसका रंग काला होता है। इस वजह से रामलला की मूर्ति श्यामल रूप में दिखाई दे रही है।

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शुभ घड़ीमें विराजे राम

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